क्या आपका बच्चा 10 साल का होकर भी आपके पास सोता है? जानें यह उसके विकास को कैसे प्रभावित कर सकता है

क्या आपका 10 साल का बच्चा अब भी पेरेंट्स के साथ सोता है? यह उसके आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को प्रभावित कर सकता है। जानें क्यों एक उम्र के बाद बच्चों को अलग सुलाने की आदत डालना जरूरी है और इसके आसान तरीके।

Photo of author

By Nutan Bhatt

Published on

kitne sal ke bacho ko alag sona chahiye

Kya Bacho ko Parents ke Pass Sona Chahiye : भारतीय परिवारों में बच्चों का अपने माता-पिता के साथ सोना (को-स्लीपिंग) एक बहुत ही आम और स्वाभाविक बात है। यह प्यार, सुरक्षा और अपनेपन का प्रतीक माना जाता है। छोटे बच्चों के लिए तो यह भावनात्मक जुड़ाव और सुरक्षा की भावना के लिए ज़रूरी भी है। लेकिन एक सवाल जो अक्सर माता-पिता के मन में दुविधा पैदा करता है, वह यह है कि इसकी सीमा क्या होनी चाहिए? क्या होगा जब आपका बच्चा 8, 10 या 12 साल का हो जाए और तब भी आपके ही बिस्तर पर सोए?

इस लेख के लिए अपने शोध में, मैंने पाया कि यह विषय सिर्फ सोने की एक आदत से कहीं बढ़कर है। यह बच्चे के मनोवैज्ञानिक विकास, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू है। एक स्वास्थ्य पत्रकार के रूप में, मेरा उद्देश्य आपको यह बताना नहीं है कि आप गलत कर रहे हैं, बल्कि एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। आइए, बाल मनोवैज्ञानिकों और विकास विशेषज्ञों की दृष्टि से समझते हैं कि एक उम्र के बाद बच्चों को अलग सुलाने की आदत (Bachchon ke Mata Pita ke Pass Sone ke Nuksan) डालना क्यों महत्वपूर्ण है और यह आप प्यार और धैर्य के साथ कैसे कर सकते हैं.

बच्चों के साथ सोना: प्यार का प्रतीक या विकास में बाधा?

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि बच्चे का आपके साथ सोना आपके प्यार की कमी नहीं, बल्कि अधिकता को दर्शाता है। आप उन्हें सुरक्षित महसूस कराना चाहते हैं। लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनकी ज़रूरतें बदलती हैं। उनका शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (American Academy of Pediatrics) जैसे संस्थान भी बच्चों में उम्र के अनुसार स्वतंत्रता को बढ़ावा देने की सलाह देते हैं।

एक उम्र के बाद, जो प्यार और सुरक्षा का प्रतीक था, वह अनजाने में बच्चे के विकास में एक बाधा बन सकता है। यह बच्चे के मन में निर्भरता की भावना को बढ़ा सकता है और उसे अकेलेपन का सामना करने के लिए तैयार होने से रोक सकता है।

10 साल के बाद साथ सोने के 5 संभावित प्रभाव

यहाँ “बुरी आदतों” की बात नहीं है, बल्कि उन संभावित विकासात्मक चुनौतियों की बात है जो लंबे समय तक पेरेंट्स के साथ सोना जारी रखने पर उत्पन्न हो सकती हैं।

1. आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता में कमी

अपने कमरे में अकेले सोना बच्चे के लिए एक बड़ा विकासात्मक मील का पत्थर है। यह उसे सिखाता है कि वह अपने दम पर सुरक्षित रह सकता है और छोटी-मोटी परेशानियों (जैसे नींद टूटना) से खुद निपट सकता है। जो बच्चे लंबे समय तक माता-पिता पर निर्भर रहते हैं, उनमें बच्चे में आत्मविश्वास की कमी देखी जा सकती है और वे नए माहौल में ढलने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं।

Bachchon ke Mata Pita ke Pass Sone ke Nuksan

2. एंग्जायटी और अकेलेपन का डर

जब बच्चा हमेशा आपके साथ सोता है, तो उसे अकेले सोने की आदत ही नहीं पड़ती। इससे उसके मन में अकेलेपन का डर बैठ सकता है। इसका असर तब दिखाई देता है जब उसे किसी स्कूल ट्रिप, कैंप या किसी रिश्तेदार के घर अकेले रुकना पड़ता है। ऐसी स्थिति में वह अत्यधिक घबराहट (Anxiety) महसूस कर सकता है।

kitne sal ke bacho ko alag sona chahiye

3. पर्सनल स्पेस और प्राइवेसी की समझ का अभाव

जैसे-जैसे बच्चे किशोरावस्था (pre-teen years) की ओर बढ़ते हैं, उनमें व्यक्तिगत स्थान (personal space) और गोपनीयता (privacy) की भावना विकसित होना महत्वपूर्ण है। अपने कमरे में सोना उन्हें यह अवसर देता है। इसी तरह, माता-पिता के लिए भी उनकी अपनी प्राइवेसी महत्वपूर्ण है, जो एक स्वस्थ पारिवारिक रिश्ते के लिए आवश्यक है।

4. नींद की गुणवत्ता पर असर

एक बिस्तर पर तीन लोगों के सोने से किसी की भी नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। बच्चे की करवटें, माता-पिता के खर्राटे या किसी एक के भी उठने से तीनों की नींद टूट सकती है। क्लीवलैंड क्लिनिक (Cleveland Clinic) के विशेषज्ञों का मानना है कि अच्छी और गहरी नींद बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

5. सामाजिक विकास में चुनौती

एक आम सवाल जो पाठक अक्सर पूछते हैं, वह यह है कि क्या इसका सामाजिक जीवन पर असर पड़ता है? हां, पड़ सकता है। जो बच्चा अपने दोस्तों के घर स्लीपओवर (sleepover) में जाने से डरता है या मना करता है क्योंकि वह अकेले नहीं सो सकता, वह धीरे-धीरे सामाजिक गतिविधियों से कटने लग सकता है।


विशेषज्ञ की राय

बच्चे को अलग सुलाना उसे खुद से दूर करना नहीं है, बल्कि उसे यह विश्वास दिलाना है कि ‘तुम अकेले भी सक्षम और सुरक्षित हो’। यह प्रक्रिया बच्चे के आत्म-सम्मान और समस्या-समाधान कौशल को बढ़ाती है। इस बदलाव को एक प्रोजेक्ट की तरह देखें, जिसे पूरे परिवार को मिलकर, प्यार और धैर्य के साथ पूरा करना है।” – डॉ. स्नेहा माथुर, पीएचडी (बाल मनोविज्ञान), नई दिल्ली


बच्चे को आत्मनिर्भर कैसे बनाएं?

बच्चों को अलग सुलाने की आदत डालना एक रात का काम नहीं है। इसमें समय, धैर्य और बहुत सारे प्यार की ज़रूरत होती है।

  1. प्यार से बात करें: बच्चे को डांटने या शर्मिंदा करने के बजाय, उसे एक ‘बड़े बच्चे’ की तरह ट्रीट करें। उसे समझाएं कि अब वह बड़ा हो रहा है और उसका अपना कमरा होना एक रोमांचक बात है।
  2. कमरे को ‘उसका’ बनाएं: बच्चे को अपने कमरे की सजावट में शामिल करें। उसे अपनी पसंद की बेडशीट, पोस्टर, खिलौने और नाइट लैंप चुनने दें। जब कमरा उसका अपना लगेगा, तो वह वहाँ समय बिताना पसंद करेगा।
  3. एक मज़बूत बेडटाइम रूटीन स्थापित करें: हर रात सोने से पहले एक निश्चित रूटीन का पालन करें। जैसे – गर्म दूध पीना, दाँत ब्रश करना, आरामदायक कपड़े पहनना और फिर बिस्तर पर लेटकर 15-20 मिनट के लिए कोई कहानी पढ़ना।
  4. धीरे-धीरे शुरुआत करें: सीधे पहली रात से ही उसे अकेले सोने के लिए न कहें। शुरुआत उसके कमरे में दिन में सोने (naps) से करें। फिर, रात में उसे उसके बिस्तर पर सुलाएं और आप उसके पास तब तक बैठें जब तक वह सो न जाए।
  5. ‘कैम्पिंग आउट’ मेथड अपनाएं: कुछ रातों के लिए आप उसके कमरे में एक गद्दा डालकर सो सकते हैं। इससे उसे अपने कमरे में सोने की आदत पड़ेगी और आपका साथ भी मिलेगा। धीरे-धीरे आप अपने बिस्तर पर वापस जा सकते हैं।
  6. प्रशंसा और सकारात्मकता: जब भी बच्चा अपने कमरे में सोए, चाहे कुछ घंटों के लिए ही क्यों न हो, सुबह उसकी बहुत प्रशंसा करें। उसकी बहादुरी की तारीफ करें।
  7. धैर्यवान और स्थिर रहें: हो सकता है कि बच्चा आधी रात को डरकर आपके कमरे में वापस आ जाए। ऐसे में गुस्सा न करें। उसे प्यार से गले लगाएं, शांत करें और वापस उसके कमरे में ले जाकर सुलाएं। आपके स्थिर व्यवहार से उसे सुरक्षा का एहसास होगा।
bacho ko alag kese sulaye

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

बच्चे को अलग सुलाने की सही उम्र क्या है?

बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी कोई एक “जादुई” उम्र नहीं है। हालांकि, ज्यादातर बच्चे 5 से 8 साल की उम्र के बीच इस बदलाव के लिए तैयार हो जाते हैं। 10 साल की उम्र तक यह प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए।

अगर बच्चा रात में रोए या डर जाए तो क्या करें?

उसे डांटें नहीं। उसके डर को समझें और उसे आश्वस्त करें कि आप पास ही हैं। उसे वापस उसके कमरे में ले जाएं, थोड़ी देर उसके पास बैठें और फिर वापस आ जाएं। मुख्य बात सीमाएं निर्धारित करना और उन पर कायम रहना है।

क्या भाई-बहन एक ही कमरे में सो सकते हैं?

बिल्कुल। भाई-बहनों का एक साथ एक कमरे में सोना बच्चे के अकेलेपन के डर को कम कर सकता है और यह माता-पिता के कमरे से बाहर सोने की दिशा में एक बहुत अच्छा मध्यवर्ती कदम हो सकता है।

निष्कर्ष

अपने 10-12 साल के बच्चे को उसके कमरे में सोने के लिए भेजना, उसे खुद से दूर करना नहीं है; यह उसे प्यार का एक अलग और ज्यादा परिपक्व रूप देने जैसा है। यह उसे आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का वह उपहार देना है, जो जीवन भर उसके काम आएगा। पेरेंट्स के साथ सोना एक खूबसूरत चरण है, लेकिन हर चरण की तरह, इसका भी अंत बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए ज़रूरी है।

यह यात्रा आपके और आपके बच्चे, दोनों के लिए थोड़ी चुनौतीपूर्ण हो सकती है, लेकिन धैर्य, स्थिरता और ढेर सारे प्यार से आप इस मील के पत्थर को आसानी से पार कर सकते हैं। याद रखें, आपका लक्ष्य एक ऐसी नींव रखना है जिस पर आपका बच्चा एक आत्मविश्वासी और सक्षम व्यक्ति के रूप में खड़ा हो सके।

Author
Nutan Bhatt
मैं नूतन भट्ट हूँ, शिवांग की माँ और mumbabysparsh.com की संस्थापक। एक नई माँ के रूप में, मैंने अपनी मातृत्व यात्रा के दौरान सीखे गए सबक और अनुभवों को साझा करने का फैसला किया। मेरा लक्ष्य है अन्य नई माओं को प्रेरित करना और उनकी मदद करना, ताकि वे इस चुनौतीपूर्ण और खुशियों भरी यात्रा में आत्मविश्वास से आगे बढ़ सकें। मेरे लेख बच्चों की देखभाल, स्वास्थ्य, और मातृत्व के सुखद अनुभवों पर केंद्रित हैं, सभी को हिंदी में सरल और सुगम भाषा में प्रस्तुत किया गया है। मैं आशा करती हूँ कि मेरे विचार और सुझाव आपकी मातृत्व यात्रा को और अधिक खुशहाल और सुगम बनाने में मदद करेंगे।

Leave a Comment